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Friday, May 16, 2008

छँटते बादल(कहानी)

केहर सिंह का मन बल्लियों उछल रहा था । कहाँ वो और कहाँ प्रीतो ! अपनी किस्मत से उसे खुद ही रश्क होने लगा था ।जब एक काले-भुजंग से दिखने वाले पहलवान को, जिसे कोई रात को देखले तो भूत का अंदेशा हो जाये, ऐसी साँवली-सलोनी पत्नी मिल जाये जिसे देख कर चाँद भी शर्माता हो तो ऐसा होना लाज़मी ही था ।

सारे गाँव में धूम सी मच गई । केहरे की बहू इस कदर खूबसूरत होगी, कोई सोच भी नहीं सकता था । मुँह-दिखाई वालों का तो तांता ही लग गया ।प्रीतो को देखने आई औरतें जब टल ही नहींरही थीं तो कुढ़ कर केहर सिंह छत पर जा कर पड़ गया और तारे गिनने लगा । सोचा,जब भीड़ टलेगी तो अपनी प्रीतो को जी भर कर निहारेगा और सारी सदरें निकाल लेगा । परन्तु ब्याह की गहमा-गहमी से वह इतना थक गया कि कब उसकी आँख लग गई पता ही नहीं चला । और जब आँख खुली तो भोर हो चुकी थी । मन ही मन गाँव की औरतों को एक भद्दी सी गाली दे कर उठ बैठा ।

तड़के ही प्रीतो को उसके माँ-बाप के घर फेरे पर ले जाना था ।उसे भी आवाज लगा कर वह जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा । सोचा, ससुराल में शायद कुछ मौका लगे और प्रीतो के भरपूर दीदार हो जायें ।

ससुराल पहुँचते-पहुँचते सूरज ढ़लने को हो आया था । केहर सिंह की बड़ी आवभगत हुई । जैसा होता ही है, साली ने भी खूब छकाया । इसी में काफी रात बीत गई । इस सारे समय में केहरसिंह के दिमाग पर प्रीतो का नशा ही छाया रहा । सोच रहा था पता नहीं कहाँ और कैसे सोने कोमिले । प्रीतो के करीब जाने का मौका मिलता है या नहीं ।पर उस पर मनों पहाड़ टूट पड़े जब उसने देखा कि प्रीतो की चारपाई उससे अलग ही बिछाई गई थी।
मरता क्या न करता । मन मसोस कर पड़ रहा । परन्तु एक बात की तसल्ली थी । दोनों की चारपाईयाँ सेहन में होने के कारण वह प्रीतो को लेटे-लेटे ही निहार सकता था, भले ही दूर से ।और प्रीतो को यूँ ही निहारते-निहारते कब आधी रात बीत गई, पता ही नहीं लगा । पर उसे नींद ही नहीं लग रही थी ।

अचानक उसे लगा जैसे कोई सपना देख रहा हो । प्रीतो हौले से अपनी चारपाई से उठी । चोर नज़रोंसे इधर-उधर देखा । केहर सिंह ने सोचा वह मौका लगा कर उसके पास आ रही थी । मन तो बल्लियों उछल रहा था, लेकिन डर भी लग रहा था । ससुराल वालों में से कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा । एक रात का सब्र भी नहीं था प्रीतो में । मन में निश्चय किया कि ऐसा कुछ उल्टा-पुल्टा नहीं होना चाहिये । सो, सोने का बहाना कर आँख मूँद कर पड़ गया ।
आँखें मूँदे-मूँदे उसने महसूस किया कि प्रीतो दबे पाँव उसके पास आई । थोड़ी देर खड़ी रही ।फिर न जाने क्या हुआ कि वापिस हो ली । केहर सिंह ने धीमे से आँख खोली तो हैरान रह गया । प्रीतो तो सेहन के किवाड़ खोल कर बाहर जा रही थी । केहर सिंह बड़े असमंजस में था । आधी रात गये प्रीतो घर से बाहर अकेली कहाँ जा रही थी, उसकी समझ से परे था । उत्सुकतावश वह भी धीमे से उठा और उसके पीछे हो लिया ।

प्रीतो अँधेरी रात में चोर नज़रों से इधर-उधर देखती हूई गाँव के बाहर की ओर चल दी । केहर सिंह हैरान-पशेमान था । प्रीतो को यह क्या हो गया था । कहीं भूत-प्रेत की छाया तो नहीं थी । या फिर नींद में चलने की आदत हो । परन्तु प्रीतो के चलने के अंदाज से ऐसा कुछ नहीं लग रहा था ।वह बड़ी सतर्कता से चली जा रही थी ।

गाँव के बाहर निकलते ही थोड़ी दूरी पर एक कुटिया थी, जिसमें इस समय भी दीपक जल रहा था ।कुटिया के बाहर पहुँच कर प्रीतो ने एक बार फिर दाँये-बाँये देखा और कुटिया में प्रवेश कर गई ।

केहर सिंह सावधानी बरतते हुए कुटिया के पीछे की ओर की खिड़की के पास पहुँचा तो वह अंदर का दृश्य देख कर दंग रह गया । प्रीतो आँखों में आँसु भरे सिर झुकाये फर्श पर बैठी हुई थी और गेरूएवस्त्र पहने एक खूबसूरत सा व्यक्ति लाल-लाल आँखें किये उसे कह रहा था -

"आने में इतनी देर क्यों कर दी ? मैंने तुझे ब्याह करने की इज़ाजत दी थी, न कि रंगरलियाँ मनाने की ।"

केहर सिंह को सारा माजरा समझ में आ गया । शायद यही वजह थी जो इतनी सुंदर लड़की को उसजैसे काले-भुजंग के साथ बांधा गया था । परन्तु फिर भी न जाने कैसे वह स्वयँ पर काबु किये साँस रोके सब कुछ देखता रहा ।

प्रीतो कुछ नहीं बोली । मुँह नीचे किये चुपचाप आँसु बहाती रही । थोड़ी देर बाद उस साधुवेशधारी का गुस्सा भी शांत हो गया । उसने प्रीतो को अपने पास खींच लिया । फिर उसके बाद केहर सिंह कीआँखों ने जो कुछ देखा उसे देख कर भी स्वयँ पर काबु रखने के लिये पहाड़ जैसा दिल चाहिये था ।ऐसा लगता था जैसे उसके पहाड़ जैसे शरीर में जैसे पहाड़ जैसा दिल ही था ।

जो सुहागरात प्रीतो को केहर सिंह के साथ मनानी चाहिये थी, वह उस साधुवेशधारी के साथ मना रहीथी । केहर सिंह की पकड़ कृपाण पर सख्त होती जा रही थी परन्तु दाँत भींचे अभी भी अपने पर काबू किये हुए था वह !

तूफान थम गया था । कुछ देर बाद साधुवेशधारी पानी पीने को बाहर निकला तो मानो केहर सिंह को मन की मुराद मिल गई हो ।मौका ताड़ कर उसने उसे पीछे से दबोच लिया और छाती में कृपाण उतारदी । वह चूँ तक भी नहीं कर पाया । बड़ी शाँति से कृपाण उसकी छाती से निकाल कर घड़े के पानी सेसाफ की, हाथ धोये औरे चुपचाप घर की ओर चल दिया ।

कुछ देर बाद प्रीतो बाहर निकली तो लाश देख कर सन्न रह गई । कुछ भी समझ न आने पर चुपचाप घर की ओर चल दी । केहर सिंह को जैसा छोड़ कर गई थी, वैसे ही आँखें बंद किये लेटे हुए पा कर वह चुपचाप बिस्तर पर जा कर पड़ गई । केहर सिंह अधखुली आँखों से सब देख रहा था । सब कुछजानते हुए भी उसने कुछ जाहिर नहीं होने दिया । प्रीतो की इस बदचलनी के बावजूद भी वह उसे खोना नहीं चाहता था । इसलिये मन ही मन निश्चय कर कि इस राज को राज ही रहने देगा, शाँत हो कर सो गया ।

उसके बाद तो उनकी जिन्दगी ऐसे कटने लगी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो । प्रीतो के व्यव्हार से प्रीतो को कभी ऐसा नहीं लगा कि वह उसे पसन्द न करती हो । उसने कभी भी उससे विमुखता नहीं दिखाई ।केहर सिंह ने भी कभी अपने मर्द होने का अहँ नहीं दिखाया । कभी भी उसे कोई ताना नहीं दिया ।इसी तरह हँसते-खेलते उनकी ब्याहता जिंदगी के पाँच साल बीत गये । इन पाँच सालों में प्रीतो केहर सिंह के तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी ।
फिर अचानक एक दिन उनकी जिंदगी में ऐसा सैलाब आया जिसके बारे में केहर सिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था । बरसातों के दिन थे ।केहर सिंह अपने खेत पर काम कर रहा था । अचानक काले-काले बादल घिर और तूफान की शक्ल में धरती पर उतर आये । अपना काम वैसा का वैसा ही छोड़ कर केहरसिंह लगभग दौड़ता हुआ घर को लौट आया ।
कुछ देर बाद बरसात थम गई । मौसम बहुत सुहाना हो गया था । ऐसे मौसम में केहर सिंह ने पकौड़े खाने की फरमाईश की । प्रीतो ने भी बड़े प्यार से आलू-प्याज के गर्मा-गर्म पकौड़े बना कर खिलाये ।

बरसात तो थम चुकी थी । परन्तु एक तो काले बादल, दूसरे शाम का झुरमुट । सो, धरती पर अन्धेरा जल्दी उतर आया था । पकौड़े खा कर केहर सिंह सुस्ती के आलम में पड़ा था । पेशाब का जोर पड़ा तो याद आया कि जल्दी में जूतियाँ तो वह खेत की मुँडेर पर ही छोड़ आया था । सुस्ती की वजह से इतना भी मन नहीं किया कि एक कदम भी चले । सो, प्रीतो को खेत से जूतियाँ लाने की गुहार लगा बैठा । प्रीतो दराँती से साग काट रही थी । बोली -

"मेरे बस का नहीं है इस अँधेरे में खेतों को जाना ।"

इतनी सी बात पर न जाने क्यों केहर सिंह का सोया हुआ अहँ पल भर को जाग गया और कहर बरपा गया ।तल्ख़ी से बोला -

"रात बारह बजे तू अकेली गाँव के बाहर जा सकती है, अब नहीँ ।"

इतना सुनना था कि साग काटते-काटते प्रीतो के हाथ रुक गये। आज केहर सिंह ने प्रीतो का दूसरा ही रुप देखा ।साग एक और फेंका और दराँती हाथ में लिये शेरनी की तरह बिफरी -

"तो वह तू था ?"

केहर सिंह को पल भर में ही अपनी भूल का एहसास हो गया । जो राज उसने सालों-साल अपने सीने में छुपाए रखा था, वह उसकी ज़रा सी चूक से रूपोश हो गया था।

उसके बाद तो जैसे प्रीतो को होश ही नहीं रहा । उसने दराँती से केहर सिंह के शरीर पर पागलों की तरह न जाने कितने ही वार किये होंगें । केहर सिंह चुपचाप वार सहता रहा । एक शब्द भी नहीं निकला उसके मुँह से । लेकिन पहाड़ जैसा शरीर भी जब और वार सहन नहीं कर पाया तो बेहोश हो कर गिर गया ।

उसे मरा जान प्रीतो ने दराँती एक और फेंकी और पड़ोस से शंकर को बुला लाई । उसके कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा ।परन्तु हालात की नजाकत को समझते हुए घायल केहर सिंह को जल्दी से टरेक्टर में डाल कर हस्पताल ले गया ।

सारे गाँव वाले दंग थे कि अचानक यह क्या हो गया । इतने प्रेम से रहते थे प्रीतो और केहर सिंह । ऐसा क्याहुआ था कि प्रीतो ने केहर सिंह को लगभग जान से ही मार डाला था ।
केहर सिंह ऐसी शख्सियत का मालिक नहीं था कि कोई और औरत उसकी ओर आकर्षित होती । और फिर, केहर सिंह भी एक नेक इन्सान था जो किसीकी और आँख उठा कर भी नहीं देखता था ।

प्रीतो मन ही मन जेल जाने की तैयारी कर चुकी थी । उसे आशा नहीं थी कि इतने वार खाने के बाद केहर सिंहबच पायेगा । गाँव वाले उसके खिलाफ हो ही चुके थे । परन्तु उसके मन को एक झटका सा लगा जब उसे पताचला कि केहर सिंह ने होश में आने के बाद पुलिस को अपने बयान में प्रीतो को निर्दोष बताया था । उसके बयानके अनुसार कुछ लोग उसके घर में लूट-पाट के इरादे से घुस आये थे । विरोध करने पर उसी की दराँती से घायल करके भाग गये । कौन लोग थे, अँधेरे की वजह से पहचान नहीं पाया ।

केहर सिंह के घाव भरने में तीन महीनों से भी ज्यादा का समय लग गया । गाँव वालों के लिये अजूबा ही था जोइतने घावों को भी केहर सिंह झेल गया था । कोई और होता तो कब का दम तोड़ चुका होता ।

इन तीन महीनों में प्रीतो का मन कशमकश में ही रहा । वह लाख चाहते हुए भी केहर सिंह को मिलने नहीं जासकी । कैसे मुँह दिखाती । एक तो उसका राज केहर सिंह पर जाहिर हो चुका था, दूसरे उसने उस पर घातकवार भी किया था ।मन ही मन पश्चाताप करते हुए उसी घर में बच्चों के साथ रहती रही । न तो गाँव वालों नेऔर न ही मायके वालों से उससे कोई नाता ही रखा ।

आज केहर सिंह को हस्पताल से छुट्टी मिलनी थी । उसको उम्मीद नहीं थी कि प्रीतो अब उससे कोई नाता रखेगी ।परन्तु उसे अपनी आँखों पर यकायक विश्वास नहीं आया जब उसने प्रीतो को अपने बिस्तर के करीब खड़ा पाया ।वह एकटक उसे ही निहारे जा रही थी ।
केहर सिंह ने धीरे से तकिये के नीचे से कृपाण निकाली और उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला -

"प्रीतो, कोई अरमान बाकी रह गया हो तो अभी भी निकाल ले ।"

बस, प्रीतो की आँखों से आँसुओं की गंगा बह निकली । केहर सिंह की छाती से लग कर वह आधा घंटा तक बिलख-बिलख कर रोती रही । इन आँसुओं की बरसात से उनके जीवन पर छाये काले बादल छँट गये । तूफान शाँत हुआ तो बड़े प्यार से केहर सिंह को घर लाई ।उनका प्यार अब भी वैसा ही था । न केहर सिंह ने कभी उन बातों का जिक्र किया, न प्रीतो ने । गाँव वाले भी हैरान थे !



6 comments:

Mired Mirage said...

रोचक कहानी है। परन्तु शायद लोगों के हाथ में कृपाण या दराँती नहीं होनी चाहिये, जो इतनी सरलता से जान लेने लगें।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

अच्छी लगी कहानी.

©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

मिराज जी,
ये कहानी कुछ-कुछ रियलिस्टिक भी है । सिक्खों के पास कृपाण होती ही है और घरों में दराँती भी होती है । और इसकी पृष्ठभूमि गाँव की है । इसलिये, मुझे यकीन है कि आप इस कहानी को उसकी पृष्ठभूमि के दृष्टि से ही देखे गें ।

©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) said...

समीरजी,

कहानी आप को अच्छी लगी, जान कर प्रसन्नता हुई ।धन्यवाद ।

Mrs. Asha Joglekar said...

कहानी अच्छी है पर प्रसंग बडे खतरनाक ।

राज भाटिय़ा said...

केहर सिंह बहुत बडे दिल का मालिक था, बहुत सुंदर कहानी. धन्यवाद